एक शायर ने कहा है "मुहब्बत मे बुरी नियत से कुछ सोचा नहीं जाता,
कहा जाता है उसको बेवफा , समझा नहीं जाता."
कोई आशिक ये कभी मान ही नहीं सकता कि "वो बेवफा थी " अरे ,मुब्ब्हत मे उन बातों पर भी यकीन करने को दिल करता है जो पता नहीं सच होती भी है या नहीं , वो बातें जो सिर्फ ख्वाब मे होती है , और जिनकी वास्तविकताओं का कभी पता नहीं चलता...मन को लगता है कि ऐसा हुआ होगा या हो रहा होगा , पर होता क्या है ये कभी पता नहीं चलता........
मै तारे गिनता हूँ रातों को , वो भी तो जाग रही होगी
मैं उससे भागा फिरता हूँ , वो मुझसे भाग रही होगी .....?
कहती है मुझको वेबफा वो अपनी सखियों में
लब थरथरा रहे होंगे , कापती जुबान रही होगी....?
उभरा था आज अस्क उनका , एक पल को शायद झरोखे पे
इन्तजार मे मेरे, खिड़की से झाकं रही होगी .....?
देखा नहीं पलटकर के मैंने तो भरपूर नजर
पर वो ओझल होने तक मुझको ही ताक़ रही होगी .....?
डाला होगा चादर जब, तन पे ढलती रातों मे
तब रोम रोम को उनके, मेरी भी याद रही होगी....?
सुना है, है इरादा उनका फिर से दिल लगाने का
अरे झूठी-मुठी बातों से गम बात रही होगी....?
अगर आया होगा याद कहीं , पिछली बारिश का मौसम तो
सुर्ख होठों को अपने वो , दाँतों से काट रही होगी.....?