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Sunday, 3 November 2013

अब भी धार बहुत है...

"जिंदगी बहुत कुछ सीखा देती है बस फीस कुछ ज्यादा लेती है "सुना था बहुत पहले पर समझ अभी आया, दोस्ती, वफादारी , प्यार बड़े  प्यारे शब्द है, बिलकुल रेगिस्तान में मृग को नजर आ रहे पानी कि तरह.... जो होता कभी नहीं है मगर दूर से देखो तो नजर जरुर आता है … जिस के तलाश में जाने कितने ही मृग , मृगतृष्णा से मर जाते है…


मेरी हस्ती अब भी मिटी नहीं, अब भी हथियार बहुत है
हाँ जंग लगे है थोड़े से पर अब भी धार बहुत है...

नफा-नुकसान का गणित , अब सीखना पड़ा मुझे
क्या करे, मेरे दोस्त ईमानदार बहुत है  ...

इतनी जल्दी भी क्या है, चुका कर हिसाब जाने की
अरे आस्तीन के सापों का, मुझपर उधार बहुत है.....

बड़ा अजीब मिजाज है इस शहर का भी
जिसके फितरत में ही धोखा है, वो वफादार बहुत है.....

चालबाजियाँ सिख कर हर कोई शहरी हो गया
इस शहर का मौसम ,भी असरदार बहुत है......

मेरी बर्बादियों का जिम्मा , दुश्मनो पर न थोपो तुम
इसके लिए तो मेरे दोस्त यार बहुत है......

उसके जाने  की खबर से, सब अनजान बने रहे
कहने को इस शहर में, यू तो अखबार बहुत है…