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Saturday, 13 March 2010

मेरी भी याद रही होगी...

एक शायर ने कहा है "मुहब्बत मे बुरी नियत से कुछ सोचा नहीं जाता, 
                                    कहा जाता है उसको बेवफा , समझा नहीं जाता."
                                              
कोई आशिक ये कभी मान ही नहीं सकता कि "वो बेवफा थी "  अरे ,मुब्ब्हत मे उन बातों पर भी यकीन करने को दिल करता है जो पता नहीं सच होती भी है या नहीं , वो बातें जो सिर्फ ख्वाब मे होती है , और जिनकी वास्तविकताओं का कभी पता नहीं चलता...मन को लगता है कि ऐसा हुआ होगा या हो रहा होगा , पर होता क्या है ये कभी पता नहीं चलता........




मै तारे गिनता हूँ रातों को , वो भी तो जाग रही होगी
मैं उससे भागा फिरता हूँ , वो मुझसे भाग रही होगी .....?

कहती है मुझको वेबफा वो अपनी सखियों में
लब थरथरा रहे होंगे , कापती जुबान रही होगी....?

उभरा था आज अस्क उनका , एक पल को शायद झरोखे पे
इन्तजार मे मेरे,  खिड़की से झाकं रही होगी .....?

देखा नहीं पलटकर के मैंने तो भरपूर नजर
पर वो ओझल होने तक मुझको ही ताक़ रही होगी .....?

डाला होगा चादर जब, तन पे ढलती रातों मे
तब रोम रोम को उनके,  मेरी भी याद रही होगी....?

सुना है,  है इरादा उनका फिर से दिल लगाने का
अरे झूठी-मुठी बातों से गम बात रही होगी....?

अगर आया होगा याद कहीं , पिछली बारिश का मौसम तो
सुर्ख होठों को अपने वो , दाँतों से काट रही होगी.....?

Tuesday, 23 February 2010

सानिया से शादी ( एक हास्य कविता)

कविता लिखने से पहले मै आपको अपने बारे में कुछ बताना चाहता हूँ , में एक छोटी औकात का आदमी हूँ इसलिए कभी कभी छोटी छोटी कल्पनाये भी कर लेता हूँ , एक बहुत छोटी सी कल्पना की हैं मैंने और जिसका शीर्षक दिया हैं ''कि अगर मौका मिले मुझे सानिया मिर्जा से शादी का''  , तो हैं ना ये एक बहुत छोटी सी कल्पना ........कविता लिख रहा हूँ मजा लीजियेगा ......


अगर मौका मिले मुझे , 
सानिया मिर्जा से शादी का 
मैं तो सौदा कर लूँगा 
झट अपनी आजादी का


भले ही वो मुझसे सारे 
काम करायेगी 
पर बीबी तो आखिर वो
मेरी ही कहलायेगी 


अरे थोड़े  कपड़े पहनती है 
वो थोड़े ही धोउंगा
बर्तन भी मंज्वाये तो
 काहे को रोउंगा


सब पति तो करते है 
मै भी कर लूँगा
अरे बठे बिठाए एक दिन 
कड़ोड़पति तो रहूँगा  


और सुन लूँगा अगर सानिया 
सुनाएगी दो बात
भला किसे बुरी लग सकती हैं
दुधारू गाय की लात


बस प्राथना करे कि सानिया मुझको
विदा कराके ले जाये 
और मेरी शादी के मौके पर
आप सब जरुर आये................

Monday, 22 February 2010

कौन साथ चलता हैं यहाँ ......

बचपन से सुना करते थें कि हम अकेले आते हैं  और अकेले ही जातें हैं , और अब जब थोड़ी समझदारी हुई तो पता नही क्यों इन बातों पर यकीन करने को दिल करता हैं. सच ही तो हैं, और मुझे तो लगता है कि हम ताउम्र  अकेले ही होते है अपने गम और खुशियों मे..... 

कौन साथ चलता हैं यहाँ , उम्रभर के लिए
ये रहबर*( रस्ते का साथी) , ये रहबर सुकून आँखों के तसल्ली है नजर  के लिए..

आज यहाँ ठहरे तो मुलाकात हो गई
कौन जाने कल हम चल देंगे किधर के लिए..

जो नेमते थी , खर्च दी यारों की मुस्कानों पे
अब बचा ही क्या है पास मेरे फिकर के लिए..

ना इबादत की जरुरत है, ना सजदा करो मेरे यारों
एक दुआ ही काफी है मुझे , असर के लिए ..

ना थमाओ रिश्तों की डोर, मैं थम ना सकूंगा
जो है, बहुत हैं , एक ऊमर के लिए ..

दूर करलो आज ही  गिले, शिकवे, शिकायतें
क्या पता फिर वक़्त ना मिले , अगर मगर के लिए ..

जो चुभने लगूं मैं आँखों में, तो खुद हे चला जाऊंगा
क्यों खर्च करोगे दो पैसे , जहर के लिए.............

Sunday, 21 February 2010

कहाँ आके रुका हूँ.....

कभी कभी जिन्दगी मे ऐसे भी पल आते है जब लगता है कि आपके लिए सब कुछ ख़त्म हो चूका है सबकुछ बिखर चूका  है और आप चाह कर के भी कुछ नहीं कर सकतें है  ,  और तो और वो लोग भी आप पर ऊँगली उठाने लगतें है जो कल तक आप के सामने आने से कतराते थें. जब आपसे लोग ये पूछ्तें  है की आपकी पहचान  क्या है ? तो सिवाए एक मौन के आपके पास कोई ऊतर नहीं होता है प्रस्तुत कविता मैंने उस समय लिखी थी जब मेरे सामने भी पहचान का संकट खरा हो चूका था , अगर आपने कभी जिन्दगी मे विफलताओं को महसूस किया है तो कहीं ना कहीं से ये आपको आपकी अपनी कहानी लगेगी .........


हार गया हूँ मैं, या बस थक कर झुका हूँ
कहाँ जाना है मुझको ,कहाँ आके रुका हूँ
कबसे गोते खा रहा हूँ इन हवाओं में इस कदर
कि जैसे दरख्तों से बिछड़ा मैं एक पत्ता टुटा हूँ......

ये कैसी स्थिरता हैं , ये कैसा ठहराव है
जिन्दगी, मानो लहरों पे खेलती हुई नाव हैं
जल रहा हूँ कड़ी धुप में , यूँ कबसे खडा मैं
ना बादल का टुकड़ा हैं , ना पेड़ों की छाव हैं
क्यों हंसी से महरूम मैं , खुशियों से जुदा हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको कहाँ आके रुका हूँ.......

ना भोर की सुगबुगाहट हैं ना चिडियों की आवाज हैं
बड़ी लम्बी ये बड़ी विचित्र रात हैं
पर क्या करूंगा मैं , सहर*(नई सुबह ) देख करके भी
ना मंजील का पता हैं , ना रास्ता ही याद हैं
मैं चिंगारी से आग बना , पर अब बुझता धुवाँ हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको , मैं कहाँ आके रुका हूँ.....

अपनी नाकामियों का जशन यूँ कब तक मनाऊँगा
इन ऊलझनों में कब तक मैं ऊलाझाता जाउंगा
कि अब तो उठने लगी हैं उन्गलीयाँ, काबिलियत पर मेरे
जो पूछेंगे सवाल लोग, तो उन्हें क्या बताऊंगा 
क्या कहूँ कि इन नाकामियों से मैं टूट चुका हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको , कहाँ आके रुका हूँ ....................................

बस मैं रंग भरूँगा ..............

मैंने ये कविता अपनी बहन के लिए लिखी थी ,ये  एक वादा था मेरा उससे इन पंकित्यों के माध्यम से ,और एक ऊमीद भी कि एक दिन सबकुछ ठीक हो जायेगा, अपनी जिंदगी को हम एक दिन अपनी उँगलियों पे नचाएंगे .....................

जीवन के इस रस्ते पर तेरे संग चलूँगा
तू सपने देखती जाना, बस मे रंग भरूँगा
सोचना ना ये कभी की तू तन्हा अकेली है
उदासी के क्षणों मे भी मैं उमंग भरूँगा .

ना कर अफ़सोस उस वक़्त पे , जो गुजरता जा रहा है
आने वाला कल तेरा , खुशियों से नहा रहा है
खड़ी हो जा दरवाजे पर तू स्वागत कर बाहें फैला
कि रात स्याह बीत रही है , नया सवेरा आ रहा है

दुआ कर खुदा से के ऐसा वक़्त आये जरूर
फक्र हो तुझे मुझपे भी , रिश्तों पर आये गुरूर
चल खुदा से साथ साथ ये दुआ भी मांग ले
कि रगड़े चिराग तू, मैं निकलू , और पूछु क्या है हुक्म हुजुर .

जितनी मर्जी तू पावं फैला , चादर मे सिलूँगा
तू सपने देखती जाना , बस मैं रंग भरूँगा ..............................