एक शायर ने कहा है "मुहब्बत मे बुरी नियत से कुछ सोचा नहीं जाता,
कहा जाता है उसको बेवफा , समझा नहीं जाता."
कोई आशिक ये कभी मान ही नहीं सकता कि "वो बेवफा थी " अरे ,मुब्ब्हत मे उन बातों पर भी यकीन करने को दिल करता है जो पता नहीं सच होती भी है या नहीं , वो बातें जो सिर्फ ख्वाब मे होती है , और जिनकी वास्तविकताओं का कभी पता नहीं चलता...मन को लगता है कि ऐसा हुआ होगा या हो रहा होगा , पर होता क्या है ये कभी पता नहीं चलता........
मै तारे गिनता हूँ रातों को , वो भी तो जाग रही होगी
मैं उससे भागा फिरता हूँ , वो मुझसे भाग रही होगी .....?
कहती है मुझको वेबफा वो अपनी सखियों में
लब थरथरा रहे होंगे , कापती जुबान रही होगी....?
उभरा था आज अस्क उनका , एक पल को शायद झरोखे पे
इन्तजार मे मेरे, खिड़की से झाकं रही होगी .....?
देखा नहीं पलटकर के मैंने तो भरपूर नजर
पर वो ओझल होने तक मुझको ही ताक़ रही होगी .....?
डाला होगा चादर जब, तन पे ढलती रातों मे
तब रोम रोम को उनके, मेरी भी याद रही होगी....?
सुना है, है इरादा उनका फिर से दिल लगाने का
अरे झूठी-मुठी बातों से गम बात रही होगी....?
अगर आया होगा याद कहीं , पिछली बारिश का मौसम तो
सुर्ख होठों को अपने वो , दाँतों से काट रही होगी.....?
शुभ नमन , मुझे पता नहीं है कि मै क्या लिखता हूँ, कुछ लोग इन्हें कविता कहते है, कुछ शायरी और कुछ शब्दों की तुकबंदी . मै तो बस इतना ही जानता हूँ कि इन शब्दों मे मेरे जीवन कि कुछ सुनी-कुछ अनसुनी बातें है , कुछ छुए-कुछ अनछुए पहलु है . अब ये आप पे है कि आप इसे क्या कहतें है , कविता ,शायरी या शब्दों की तुकबंदी .................
Saturday, 13 March 2010
Tuesday, 23 February 2010
सानिया से शादी ( एक हास्य कविता)
कविता लिखने से पहले मै आपको अपने बारे में कुछ बताना चाहता हूँ , में एक छोटी औकात का आदमी हूँ इसलिए कभी कभी छोटी छोटी कल्पनाये भी कर लेता हूँ , एक बहुत छोटी सी कल्पना की हैं मैंने और जिसका शीर्षक दिया हैं ''कि अगर मौका मिले मुझे सानिया मिर्जा से शादी का'' , तो हैं ना ये एक बहुत छोटी सी कल्पना ........कविता लिख रहा हूँ मजा लीजियेगा ......
अगर मौका मिले मुझे ,
सानिया मिर्जा से शादी का
मैं तो सौदा कर लूँगा
झट अपनी आजादी का
भले ही वो मुझसे सारे
काम करायेगी
पर बीबी तो आखिर वो
मेरी ही कहलायेगी
अरे थोड़े कपड़े पहनती है
वो थोड़े ही धोउंगा
बर्तन भी मंज्वाये तो
काहे को रोउंगा
सब पति तो करते है
मै भी कर लूँगा
अरे बठे बिठाए एक दिन
कड़ोड़पति तो रहूँगा
और सुन लूँगा अगर सानिया
सुनाएगी दो बात
भला किसे बुरी लग सकती हैं
दुधारू गाय की लात
बस प्राथना करे कि सानिया मुझको
विदा कराके ले जाये
और मेरी शादी के मौके पर
आप सब जरुर आये................
अगर मौका मिले मुझे ,
सानिया मिर्जा से शादी का
मैं तो सौदा कर लूँगा
झट अपनी आजादी का
भले ही वो मुझसे सारे
काम करायेगी
पर बीबी तो आखिर वो
मेरी ही कहलायेगी
अरे थोड़े कपड़े पहनती है
वो थोड़े ही धोउंगा
बर्तन भी मंज्वाये तो
काहे को रोउंगा
सब पति तो करते है
मै भी कर लूँगा
अरे बठे बिठाए एक दिन
कड़ोड़पति तो रहूँगा
और सुन लूँगा अगर सानिया
सुनाएगी दो बात
भला किसे बुरी लग सकती हैं
दुधारू गाय की लात
बस प्राथना करे कि सानिया मुझको
विदा कराके ले जाये
और मेरी शादी के मौके पर
आप सब जरुर आये................
Monday, 22 February 2010
कौन साथ चलता हैं यहाँ ......
बचपन से सुना करते थें कि हम अकेले आते हैं और अकेले ही जातें हैं , और अब जब थोड़ी समझदारी हुई तो पता नही क्यों इन बातों पर यकीन करने को दिल करता हैं. सच ही तो हैं, और मुझे तो लगता है कि हम ताउम्र अकेले ही होते है अपने गम और खुशियों मे.....
कौन साथ चलता हैं यहाँ , उम्रभर के लिए
ये रहबर*( रस्ते का साथी) , ये रहबर सुकून आँखों के तसल्ली है नजर के लिए..
आज यहाँ ठहरे तो मुलाकात हो गई
कौन जाने कल हम चल देंगे किधर के लिए..
जो नेमते थी , खर्च दी यारों की मुस्कानों पे
अब बचा ही क्या है पास मेरे फिकर के लिए..
ना इबादत की जरुरत है, ना सजदा करो मेरे यारों
एक दुआ ही काफी है मुझे , असर के लिए ..
ना थमाओ रिश्तों की डोर, मैं थम ना सकूंगा
जो है, बहुत हैं , एक ऊमर के लिए ..
दूर करलो आज ही गिले, शिकवे, शिकायतें
क्या पता फिर वक़्त ना मिले , अगर मगर के लिए ..
जो चुभने लगूं मैं आँखों में, तो खुद हे चला जाऊंगा
क्यों खर्च करोगे दो पैसे , जहर के लिए.............
कौन साथ चलता हैं यहाँ , उम्रभर के लिए
ये रहबर*( रस्ते का साथी) , ये रहबर सुकून आँखों के तसल्ली है नजर के लिए..
आज यहाँ ठहरे तो मुलाकात हो गई
कौन जाने कल हम चल देंगे किधर के लिए..
जो नेमते थी , खर्च दी यारों की मुस्कानों पे
अब बचा ही क्या है पास मेरे फिकर के लिए..
ना इबादत की जरुरत है, ना सजदा करो मेरे यारों
एक दुआ ही काफी है मुझे , असर के लिए ..
ना थमाओ रिश्तों की डोर, मैं थम ना सकूंगा
जो है, बहुत हैं , एक ऊमर के लिए ..
दूर करलो आज ही गिले, शिकवे, शिकायतें
क्या पता फिर वक़्त ना मिले , अगर मगर के लिए ..
जो चुभने लगूं मैं आँखों में, तो खुद हे चला जाऊंगा
क्यों खर्च करोगे दो पैसे , जहर के लिए.............
Sunday, 21 February 2010
कहाँ आके रुका हूँ.....
कभी कभी जिन्दगी मे ऐसे भी पल आते है जब लगता है कि आपके लिए सब कुछ ख़त्म हो चूका है सबकुछ बिखर चूका है और आप चाह कर के भी कुछ नहीं कर सकतें है , और तो और वो लोग भी आप पर ऊँगली उठाने लगतें है जो कल तक आप के सामने आने से कतराते थें. जब आपसे लोग ये पूछ्तें है की आपकी पहचान क्या है ? तो सिवाए एक मौन के आपके पास कोई ऊतर नहीं होता है प्रस्तुत कविता मैंने उस समय लिखी थी जब मेरे सामने भी पहचान का संकट खरा हो चूका था , अगर आपने कभी जिन्दगी मे विफलताओं को महसूस किया है तो कहीं ना कहीं से ये आपको आपकी अपनी कहानी लगेगी .........
हार गया हूँ मैं, या बस थक कर झुका हूँ
कहाँ जाना है मुझको ,कहाँ आके रुका हूँ
कबसे गोते खा रहा हूँ इन हवाओं में इस कदर
कि जैसे दरख्तों से बिछड़ा मैं एक पत्ता टुटा हूँ......
ये कैसी स्थिरता हैं , ये कैसा ठहराव है
जिन्दगी, मानो लहरों पे खेलती हुई नाव हैं
जल रहा हूँ कड़ी धुप में , यूँ कबसे खडा मैं
ना बादल का टुकड़ा हैं , ना पेड़ों की छाव हैं
क्यों हंसी से महरूम मैं , खुशियों से जुदा हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको कहाँ आके रुका हूँ.......
ना भोर की सुगबुगाहट हैं ना चिडियों की आवाज हैं
बड़ी लम्बी ये बड़ी विचित्र रात हैं
पर क्या करूंगा मैं , सहर*(नई सुबह ) देख करके भी
ना मंजील का पता हैं , ना रास्ता ही याद हैं
मैं चिंगारी से आग बना , पर अब बुझता धुवाँ हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको , मैं कहाँ आके रुका हूँ.....
अपनी नाकामियों का जशन यूँ कब तक मनाऊँगा
इन ऊलझनों में कब तक मैं ऊलाझाता जाउंगा
कि अब तो उठने लगी हैं उन्गलीयाँ, काबिलियत पर मेरे
जो पूछेंगे सवाल लोग, तो उन्हें क्या बताऊंगा
क्या कहूँ कि इन नाकामियों से मैं टूट चुका हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको , कहाँ आके रुका हूँ ....................................
हार गया हूँ मैं, या बस थक कर झुका हूँ
कहाँ जाना है मुझको ,कहाँ आके रुका हूँ
कबसे गोते खा रहा हूँ इन हवाओं में इस कदर
कि जैसे दरख्तों से बिछड़ा मैं एक पत्ता टुटा हूँ......
ये कैसी स्थिरता हैं , ये कैसा ठहराव है
जिन्दगी, मानो लहरों पे खेलती हुई नाव हैं
जल रहा हूँ कड़ी धुप में , यूँ कबसे खडा मैं
ना बादल का टुकड़ा हैं , ना पेड़ों की छाव हैं
क्यों हंसी से महरूम मैं , खुशियों से जुदा हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको कहाँ आके रुका हूँ.......
ना भोर की सुगबुगाहट हैं ना चिडियों की आवाज हैं
बड़ी लम्बी ये बड़ी विचित्र रात हैं
पर क्या करूंगा मैं , सहर*(नई सुबह ) देख करके भी
ना मंजील का पता हैं , ना रास्ता ही याद हैं
मैं चिंगारी से आग बना , पर अब बुझता धुवाँ हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको , मैं कहाँ आके रुका हूँ.....
अपनी नाकामियों का जशन यूँ कब तक मनाऊँगा
इन ऊलझनों में कब तक मैं ऊलाझाता जाउंगा
कि अब तो उठने लगी हैं उन्गलीयाँ, काबिलियत पर मेरे
जो पूछेंगे सवाल लोग, तो उन्हें क्या बताऊंगा
क्या कहूँ कि इन नाकामियों से मैं टूट चुका हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको , कहाँ आके रुका हूँ ....................................
बस मैं रंग भरूँगा ..............
मैंने ये कविता अपनी बहन के लिए लिखी थी ,ये एक वादा था मेरा उससे इन पंकित्यों के माध्यम से ,और एक ऊमीद भी कि एक दिन सबकुछ ठीक हो जायेगा, अपनी जिंदगी को हम एक दिन अपनी उँगलियों पे नचाएंगे .....................
जीवन के इस रस्ते पर तेरे संग चलूँगा
तू सपने देखती जाना, बस मे रंग भरूँगा
सोचना ना ये कभी की तू तन्हा अकेली है
उदासी के क्षणों मे भी मैं उमंग भरूँगा .
ना कर अफ़सोस उस वक़्त पे , जो गुजरता जा रहा है
आने वाला कल तेरा , खुशियों से नहा रहा है
खड़ी हो जा दरवाजे पर तू स्वागत कर बाहें फैला
कि रात स्याह बीत रही है , नया सवेरा आ रहा है
दुआ कर खुदा से के ऐसा वक़्त आये जरूर
फक्र हो तुझे मुझपे भी , रिश्तों पर आये गुरूर
चल खुदा से साथ साथ ये दुआ भी मांग ले
कि रगड़े चिराग तू, मैं निकलू , और पूछु क्या है हुक्म हुजुर .
जितनी मर्जी तू पावं फैला , चादर मे सिलूँगा
तू सपने देखती जाना , बस मैं रंग भरूँगा ..............................
जीवन के इस रस्ते पर तेरे संग चलूँगा
तू सपने देखती जाना, बस मे रंग भरूँगा
सोचना ना ये कभी की तू तन्हा अकेली है
उदासी के क्षणों मे भी मैं उमंग भरूँगा .
ना कर अफ़सोस उस वक़्त पे , जो गुजरता जा रहा है
आने वाला कल तेरा , खुशियों से नहा रहा है
खड़ी हो जा दरवाजे पर तू स्वागत कर बाहें फैला
कि रात स्याह बीत रही है , नया सवेरा आ रहा है
दुआ कर खुदा से के ऐसा वक़्त आये जरूर
फक्र हो तुझे मुझपे भी , रिश्तों पर आये गुरूर
चल खुदा से साथ साथ ये दुआ भी मांग ले
कि रगड़े चिराग तू, मैं निकलू , और पूछु क्या है हुक्म हुजुर .
जितनी मर्जी तू पावं फैला , चादर मे सिलूँगा
तू सपने देखती जाना , बस मैं रंग भरूँगा ..............................
एक छोटी सी दुनिया .......
ये एक कल्पना है एक बहुत प्यारी , सपनो जैसी दुनिया की .
ये एक उम्मीद है एक ख्वाब है और कुछ नहीं....
एक छोटी सी दुनिया हो मेरी
एक छोटा सा जहान हो
जहाँ रिश्ते सर छुपा सके
ऐसा एक मकान हो.
हर ईट प्यार से जुड़े
हर ईट मे ही याद हो
दीवार नहीं हो रिश्तों में
बस प्यार की बुनियाद हो.
खनक हो उनके चूड़ी की
और पायल की झंकार हो
आँख खुले जब सुबह सुबह
तो बस उनका दीदार हो.
जहाँ मैं रहूँ , वो रहे
और चांदनी रात हो
हवा चले कुछ मद्धम मद्धम
तारों की बरसात हो.
जुल्फों मैं उनके दिन गुजरे
बाँहों मैं उनके शाम हो
हो प्यार की लाली होठों पर
और जुबान पर मेरा नाम हो.
ना कोई सीमायें हो
ना जिक्र कही हो बंधन का
आँखों की भाषा आँखें पढले
हो प्यार जरिया संबोधन का.
इस प्यार से कुछ फूल खिले
कुछ नाम हो उनके प्यारे से
छाया हो हम दोनों की
लगे वो कुछ हमारे से.
फिर प्यार सुने और प्यार कहे
बस प्यार रहे और प्यार रहे
प्यार ही आगाज था और प्यार ही अंजाम हो
प्यार के ही छाँव तले जिंदगी की शाम हो ..............................
ये एक उम्मीद है एक ख्वाब है और कुछ नहीं....
एक छोटी सी दुनिया हो मेरी
एक छोटा सा जहान हो
जहाँ रिश्ते सर छुपा सके
ऐसा एक मकान हो.
हर ईट प्यार से जुड़े
हर ईट मे ही याद हो
दीवार नहीं हो रिश्तों में
बस प्यार की बुनियाद हो.
खनक हो उनके चूड़ी की
और पायल की झंकार हो
आँख खुले जब सुबह सुबह
तो बस उनका दीदार हो.
जहाँ मैं रहूँ , वो रहे
और चांदनी रात हो
हवा चले कुछ मद्धम मद्धम
तारों की बरसात हो.
जुल्फों मैं उनके दिन गुजरे
बाँहों मैं उनके शाम हो
हो प्यार की लाली होठों पर
और जुबान पर मेरा नाम हो.
ना कोई सीमायें हो
ना जिक्र कही हो बंधन का
आँखों की भाषा आँखें पढले
हो प्यार जरिया संबोधन का.
इस प्यार से कुछ फूल खिले
कुछ नाम हो उनके प्यारे से
छाया हो हम दोनों की
लगे वो कुछ हमारे से.
फिर प्यार सुने और प्यार कहे
बस प्यार रहे और प्यार रहे
प्यार ही आगाज था और प्यार ही अंजाम हो
प्यार के ही छाँव तले जिंदगी की शाम हो ..............................
Saturday, 20 February 2010
अभी से ही बहक रहा है .......
कभी कभी जब मन को मनचाहा मिल जाता है , या मिलने की उमीद रहती है तो वो फिर बहकने लगता है और वो इतना बहक जाता है कि उसे कहना पड़ता है कि.............
संभल ऐ दिल तू इतना क्यों धड़क रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है
पैमाना तो उनके लैब है , उनका साथ साकी है
मयखाना सुख गया तो क्या हुआ , लबो पे प्यास बाकी है
जाओ जाकर कह दो उनसे, अभी हम मद्होश ना होंगे
कि उनकी साँसों कि छुअन उनका अहसास बाकी है
क्यों हर कोना दिल का उनकी खुशबू से महक रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है
कब तक सन्नाटों मे तू उनका नाम पुकारेगा
कितनी रातों को उनकी यादों से सवारेगा
जा अभी सो जा तू नींद पूरी कर ले
तभी तो उनकी बाहों मे रात गुजरेगा
तरी साँसों मे ये गर्मी कैसी , क्यों ये दहक रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है
अरे होश मे आ , होश में आ , अभी तो संभालना है
अभी तो दो जिस्मो को , दो ज़ानो को मिलना है
बस बंद कर निगाहे और महसूस कर उस पल को
जब तेरे प्यार को तेरे बाहों मे पिघलना है
बस सोच कर ही सबकुछ तू इतना क्यों चहक रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है
क्यों उनकी यादों मे रात ख़राब कर रहा है
क्यों रेत पर नाम लिखकर वक़्त बर्बाद कर रहा है
ये उदासी कैसी , और तेरी हंसी कहाँ गयी
अरे खुशिया मन कमबख्त तू प्यार कर रहा है
संभल संभल संभल, तू इतना क्यों धड़क रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है .............................
संभल ऐ दिल तू इतना क्यों धड़क रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है
पैमाना तो उनके लैब है , उनका साथ साकी है
मयखाना सुख गया तो क्या हुआ , लबो पे प्यास बाकी है
जाओ जाकर कह दो उनसे, अभी हम मद्होश ना होंगे
कि उनकी साँसों कि छुअन उनका अहसास बाकी है
क्यों हर कोना दिल का उनकी खुशबू से महक रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है
कब तक सन्नाटों मे तू उनका नाम पुकारेगा
कितनी रातों को उनकी यादों से सवारेगा
जा अभी सो जा तू नींद पूरी कर ले
तभी तो उनकी बाहों मे रात गुजरेगा
तरी साँसों मे ये गर्मी कैसी , क्यों ये दहक रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है
अरे होश मे आ , होश में आ , अभी तो संभालना है
अभी तो दो जिस्मो को , दो ज़ानो को मिलना है
बस बंद कर निगाहे और महसूस कर उस पल को
जब तेरे प्यार को तेरे बाहों मे पिघलना है
बस सोच कर ही सबकुछ तू इतना क्यों चहक रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है
क्यों उनकी यादों मे रात ख़राब कर रहा है
क्यों रेत पर नाम लिखकर वक़्त बर्बाद कर रहा है
ये उदासी कैसी , और तेरी हंसी कहाँ गयी
अरे खुशिया मन कमबख्त तू प्यार कर रहा है
संभल संभल संभल, तू इतना क्यों धड़क रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है .............................
सब कुछ तो वही था...............
..........और एक दिन उसकी शादी हो गयी, वो चली गयी मेरी दुनिया से, लोगों ने कहा हमेशा हमेशा के लिए , और फिर लोगों ने कहा 'कि वो बहुत खुश है अपनी दुनिया में, मेरे लिए सबकुछ ख़त्म हो गया ' वो भरोसा, वो उम्मीद, वो बातें , वो सपने, वो प्यार सब कुछ... ....... सब कुछ ख़त्म हो गया. पर मुझे यकीन था कि "ना मै हारा हु ना मेरा प्यार".... और एक दिन वो मुझे से मिली , बिलकुल उसी तरह .........................................
मै वक़्त के दौर मे पीछे रह गया
वो जाने किस गली मे खो गयी
सुना था कि सब बदल गया
कह रहे थे लोग कि वो किसी और की हो गयी ,
फिर ये सुना था कि वो बदल जाएगी ,
पर मुझे यकीं था ,कि वो जब भी आएगी ,वैसे ही आएगी
अब लोग गलत थे मै बिलकुल सही था
कहाँ कुछ बदला था , सबकुछ तो वही था
वही बातें थी उसकी, वही हंसी थी
उस खास शब्द पे आके आज फिर वो फ़सी थी
वो वैसी ही भोली थी , वैसा ही मन था
वही शालीनता थी उसमे , वही अपनापन था
उसके हंसने , बोलने, चलने का ढंग वही था
और तो और, उसके नाखून पालिश का भी रंग वही था
दिखा नहीं मुझे तो उसपे , वक़्त का कोई असर
अरे हां , आज भी पसंद था उसे फ्रिज का वही मरुन कलर
"वो बदल जाएगी", ये सारी बातें थी बेकार
कहाँ कुछ बदला था सब कुछ तो वही था यार
पर कुछ तो नया उसके जीवन मे चल रहा था
वो उस चाँद का टुकरा था , जो आँचल तले पल रहा था
वो बहुत प्यारी बहुत मासूम बच्ची थी
एक शब्द मे कहें तो वो बहुत बहुत अछ्छी थी
वो माँ जैसी थी , हां हां वही रूप था
वो उसके कंधे पे सोई थी , वो दृश्य भी क्या खूब था
गोद मे मेरे वो थी , मेरे हाथ मे था उसका छोटा हाथ
वो बिलकुल सपने जैस था , जिसपर मुश्किल था करना बिश्वास
वो जो बातें कि थी हमने कभी जागती रातों मे
इसका भी तो जिक्र था , उन सपनो जैसी बातों मे
उस एक पल मे उस बच्ची ने मुझे बहुत कुछ था दे दिया
जिन्दगी की कुछ लम्हें तेरे नाम भी थे 'जिया '
ये पल ये लम्हा हमेशा याद रहेगा
ताउम्र मेरे साथ ये बिश्वास रहेगा
ना मै हारा हु ना मेरा प्यार
वो फिर मिलेंगी मुझसे , मुझे बिश्वास रहेगा..............................
मै वक़्त के दौर मे पीछे रह गया
वो जाने किस गली मे खो गयी
सुना था कि सब बदल गया
कह रहे थे लोग कि वो किसी और की हो गयी ,
फिर ये सुना था कि वो बदल जाएगी ,
पर मुझे यकीं था ,कि वो जब भी आएगी ,वैसे ही आएगी
अब लोग गलत थे मै बिलकुल सही था
कहाँ कुछ बदला था , सबकुछ तो वही था
वही बातें थी उसकी, वही हंसी थी
उस खास शब्द पे आके आज फिर वो फ़सी थी
वो वैसी ही भोली थी , वैसा ही मन था
वही शालीनता थी उसमे , वही अपनापन था
उसके हंसने , बोलने, चलने का ढंग वही था
और तो और, उसके नाखून पालिश का भी रंग वही था
दिखा नहीं मुझे तो उसपे , वक़्त का कोई असर
अरे हां , आज भी पसंद था उसे फ्रिज का वही मरुन कलर
"वो बदल जाएगी", ये सारी बातें थी बेकार
कहाँ कुछ बदला था सब कुछ तो वही था यार
पर कुछ तो नया उसके जीवन मे चल रहा था
वो उस चाँद का टुकरा था , जो आँचल तले पल रहा था
वो बहुत प्यारी बहुत मासूम बच्ची थी
एक शब्द मे कहें तो वो बहुत बहुत अछ्छी थी
वो माँ जैसी थी , हां हां वही रूप था
वो उसके कंधे पे सोई थी , वो दृश्य भी क्या खूब था
गोद मे मेरे वो थी , मेरे हाथ मे था उसका छोटा हाथ
वो बिलकुल सपने जैस था , जिसपर मुश्किल था करना बिश्वास
वो जो बातें कि थी हमने कभी जागती रातों मे
इसका भी तो जिक्र था , उन सपनो जैसी बातों मे
उस एक पल मे उस बच्ची ने मुझे बहुत कुछ था दे दिया
जिन्दगी की कुछ लम्हें तेरे नाम भी थे 'जिया '
ये पल ये लम्हा हमेशा याद रहेगा
ताउम्र मेरे साथ ये बिश्वास रहेगा
ना मै हारा हु ना मेरा प्यार
वो फिर मिलेंगी मुझसे , मुझे बिश्वास रहेगा..............................
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