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Sunday, 21 February 2010

कहाँ आके रुका हूँ.....

कभी कभी जिन्दगी मे ऐसे भी पल आते है जब लगता है कि आपके लिए सब कुछ ख़त्म हो चूका है सबकुछ बिखर चूका  है और आप चाह कर के भी कुछ नहीं कर सकतें है  ,  और तो और वो लोग भी आप पर ऊँगली उठाने लगतें है जो कल तक आप के सामने आने से कतराते थें. जब आपसे लोग ये पूछ्तें  है की आपकी पहचान  क्या है ? तो सिवाए एक मौन के आपके पास कोई ऊतर नहीं होता है प्रस्तुत कविता मैंने उस समय लिखी थी जब मेरे सामने भी पहचान का संकट खरा हो चूका था , अगर आपने कभी जिन्दगी मे विफलताओं को महसूस किया है तो कहीं ना कहीं से ये आपको आपकी अपनी कहानी लगेगी .........


हार गया हूँ मैं, या बस थक कर झुका हूँ
कहाँ जाना है मुझको ,कहाँ आके रुका हूँ
कबसे गोते खा रहा हूँ इन हवाओं में इस कदर
कि जैसे दरख्तों से बिछड़ा मैं एक पत्ता टुटा हूँ......

ये कैसी स्थिरता हैं , ये कैसा ठहराव है
जिन्दगी, मानो लहरों पे खेलती हुई नाव हैं
जल रहा हूँ कड़ी धुप में , यूँ कबसे खडा मैं
ना बादल का टुकड़ा हैं , ना पेड़ों की छाव हैं
क्यों हंसी से महरूम मैं , खुशियों से जुदा हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको कहाँ आके रुका हूँ.......

ना भोर की सुगबुगाहट हैं ना चिडियों की आवाज हैं
बड़ी लम्बी ये बड़ी विचित्र रात हैं
पर क्या करूंगा मैं , सहर*(नई सुबह ) देख करके भी
ना मंजील का पता हैं , ना रास्ता ही याद हैं
मैं चिंगारी से आग बना , पर अब बुझता धुवाँ हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको , मैं कहाँ आके रुका हूँ.....

अपनी नाकामियों का जशन यूँ कब तक मनाऊँगा
इन ऊलझनों में कब तक मैं ऊलाझाता जाउंगा
कि अब तो उठने लगी हैं उन्गलीयाँ, काबिलियत पर मेरे
जो पूछेंगे सवाल लोग, तो उन्हें क्या बताऊंगा 
क्या कहूँ कि इन नाकामियों से मैं टूट चुका हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको , कहाँ आके रुका हूँ ....................................

6 comments:

  1. अपूर्व .....28 March 2010 at 12:54 pm

    one of your best poems as i know.......
    ....just remember the time/situation when you had written this poem!!!

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  2. Thanks bro for this comment....i could not sleep whole night . really i had forgotten those days........... thanks a lot for awaking me.......

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  3. well written...
    kahan aakae mae ruka hoon....
    abhi to too ruka hai par jab too chalega to havyein bhi tera saath degi...
    awsome poem
    from : Gaurav Agarwal

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  4. is poem ko ek positive note pe end karo.. with due respect to ur work...hindi me type karna ata nai isliye english me hi...
    raaste bahut hai zindagi me
    manzilen bhi bahut si ayengi
    thak kar tu jo ruk gaya
    toh umar wahi kat jayegi
    abi na ruk tu abhi na jhuk
    ki safar abhi to baaki hai
    dhundh lega manzil ko
    gar marzi us khuda ki hai..

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  5. ANUBHAV KI BAAT HAI...SUGATHIT ABIVYAKTI HAI...LACHAARI SAH ABHAVON KA PRADARSHAN HAI... SAHI HAI...PAR SHAYAD KUCH GALAT HAI... KYA YAH ANUBHAVON KI ABHIVYAKTI HAI...VYAKTI KA GALA GHONT'TA NAIRASHYA...YA KEVAL EK KAVYA RACHNA... AAPKI ISS KAVITA NE HUMEN KAI PRASHNAVACHAK CHINHA DIYE HAIN... MAIN YAH SPASHT KAR DU KI YAH EK AALOCHNATMAK TIPPNI NAHI...PARANTU MAUN SWIKRITI BHI NAHIN...

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