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Friday, 29 January 2016

 हर सवाल के जवाब  में बस एक मुस्कान ,जिंदगी से भरी हुई। भले ही  उस के पास समाधान न होता हो  हर उलझन का, पर  वक़्त जरूर होता था आप को सुनने के लिए. लाख टेक की उस एक मुस्कान के लिए मेरी लिखी हुई एक कविता। एक पुरानी कविता  ....... 

हर रंग को, हर भाव को, उफ्फ यूँ छुपाना 
क्या कमाल है तेरा भी मुस्कुराना,

सम्मोहन है, या जादू है , ये छवी तुम्हारी मायावी 
गया काम से बेचारा , जो पास तुम्हारे आया भी , 

अब अपनी हालत क्या बताऊँ , ये पंक्तियाँ खुद बोलेगी,
राज- ए - दिल, शब्द शब्द, रफ्ता रफ्ता खोलेंगी,

हसूँ, मुस्कुराऊँ, या  गुम जाऊं 
या की मैं , तुम हो जाऊं,

तुम रंग हो , उम्मीद हो , हो बंदगी ,
मेरे शब्द है उलझे हुए, है उलझी हुई जिंदगी,

ना  उम्मीद , ना  गीत है, ना  रंग है ना  सादगी 
खानाबदोश फिर रहा, मैं , दरबदर , आवारगी 

उफ्फ्फ , क्यों तुली है जिंदगी, हर दर्द आजमाने में,
समेट लो न फिर मुझे, उस ठौर उस ठिकाने में 

जहां छावं थी प्यार की, सुकून मिलता था 
तुम्हारा दिल, वो दरवाजा , जो हर  दस्तक पर खुलता था,

गीत मेरे दिल की देखो,अनसुना ना छोड़ देना,
ले तो लो जो दे रहा हु , बाद में फिर तोड़ देना 

ये दूरियां ये कश्मकश कुछ कम तो हो 
मैं तुम , तुम मैं , कभी हम तो हो. ....... 







Sunday, 3 November 2013

अब भी धार बहुत है...

"जिंदगी बहुत कुछ सीखा देती है बस फीस कुछ ज्यादा लेती है "सुना था बहुत पहले पर समझ अभी आया, दोस्ती, वफादारी , प्यार बड़े  प्यारे शब्द है, बिलकुल रेगिस्तान में मृग को नजर आ रहे पानी कि तरह.... जो होता कभी नहीं है मगर दूर से देखो तो नजर जरुर आता है … जिस के तलाश में जाने कितने ही मृग , मृगतृष्णा से मर जाते है…


मेरी हस्ती अब भी मिटी नहीं, अब भी हथियार बहुत है
हाँ जंग लगे है थोड़े से पर अब भी धार बहुत है...

नफा-नुकसान का गणित , अब सीखना पड़ा मुझे
क्या करे, मेरे दोस्त ईमानदार बहुत है  ...

इतनी जल्दी भी क्या है, चुका कर हिसाब जाने की
अरे आस्तीन के सापों का, मुझपर उधार बहुत है.....

बड़ा अजीब मिजाज है इस शहर का भी
जिसके फितरत में ही धोखा है, वो वफादार बहुत है.....

चालबाजियाँ सिख कर हर कोई शहरी हो गया
इस शहर का मौसम ,भी असरदार बहुत है......

मेरी बर्बादियों का जिम्मा , दुश्मनो पर न थोपो तुम
इसके लिए तो मेरे दोस्त यार बहुत है......

उसके जाने  की खबर से, सब अनजान बने रहे
कहने को इस शहर में, यू तो अखबार बहुत है…

Wednesday, 18 September 2013

वो एक रात बाकी है……

सपनो और हकीकत कि लड़ाई में फिर एक बार एक सपना हार गया , एक कहानी और खत्म हो गयी......  कभी नजदीकिया इतनी थी कि उनकी धड़कनो का संगीत भी सुनाई देता था और आज.....  कुछ नहीं बचा.…बस कुछ अहसाह बाकी  रह गये.....  कुछ यादें बाकी रह गयी.


मेरी सासों में तेरी खुशबु, तेरा अहसास बाकी है 
न बुझ सकी थी जो कभी, वो प्यास बाकी है
मेरे महबूब ,  मुझे फिर वो रात अता करना***
मेरे हिस्से में अब  भी , वो एक रात बाकी है

वो  मोम सा पिघलता जिस्म, वो फूलती सासें 
वो बिखरी बिखरी जुल्फे और प्यार की बातें 

वो फुल से शब्द, जो,  हवाओं में बिखरे थे 
उन शब्दो की अब भी वो,  मिठास बाकी है
मेरे महबूब ,  मुझे फिर वो रात अता करना
मेरे हिस्से में अब  भी , वो एक रात बाकी है 

वो अधखुले से होठ, वो अधखुली आँखे 
कुछ पिसती हुए कलियाँ और सिलवटे ही सिलवटे 

जिन सिलवटो के बीच खोये पड़े थे हम 
तुम आओगी वापस, उनकी, ये आस बाकी है 
मेरे महबूब ,  मुझे फिर वो रात अता करना
मेरे हिस्से में अब  भी , वो एक रात बाकी है

यूँ सिमटी थी बाँहों में, तुम, बहकी नदी सी 
उस नदी की अब भी मुझे, तलाश बाकी है 

तपिश उस रात की, क्या कहे,बस  यु समझ लो 
लबो पे रक्खा था जो अंगारा, उसकी आग बाकी है
मेरे महबूब ,  मुझे फिर वो रात अता करना
मेरे हिस्से में अब  भी , वो एक रात बाकी है 

जिन्दगी, गयी , तेरे साथ मेरे हमदम 
अब तो बस ,चलती फिरती ,लाश बाकी है 
मेरे  महबूब मुझे फिर वो रात अता करना 
मेरे हिस्से में अब भी ,वो एक रात बाकी है…… 
                                                         *** (अता करना  मतलब देना) 
                   

Thursday, 12 April 2012

कितनी मज़बूरी थी ..

कल एक कयामत , छू के बहुत नजदीक से गुजरी थी ,
उफ़ कितना बेबस था मै..कितनी मज़बूरी थी ..
वास्ता प्यार का था..जिसने रोक रखा था मुझको ....
इतने करीब तो थे हम...बस इतनी ,  तो  दूरी थी...

वो दहकता अंगारा ..काले लिबास में..
कहा बचा था मै..होशो हवाश  में..
लग जाती आग या खुद जल जाता मै...
मदहोशी थी  गहरी बहुत...उस अहसास में.....

ख्वाब कई दिखा कर के ...नींदे चुराने की ...
वो ठहराव नजरो का..कातिल अदा मुस्काने की
जोगन  कहू..जालिम कहू या की सितमगर,  उसे
आदत है गन्दी बहुत   बिजलिया गिराने की.....


पलके बिछाए बैठे थे

उमंगो के तूफान को ..दिल में  को दबाये बैठे थे 
हमें लगा था हम..कुछ छुपाये  बैठे थे .....

उन के आँखों में डूबने का शौक था हमें
और वो ,.... नजरे झुकाए बैठे थे.......

चाहा  था बाहों में भींच लू कस कर
पर वो.. खुद में ही.... सिमटे समाये बैठे थे...

ख़ामोशी को  फासले का नाम दे दिया 
अरे हम तो... पलके बिछाए बैठे  थे ....

उनके बिना जीना मुमकिन नहीं है अब 
और हम उन से ही... गुस्साए बैठे थे?...