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Thursday, 12 April 2012

कितनी मज़बूरी थी ..

कल एक कयामत , छू के बहुत नजदीक से गुजरी थी ,
उफ़ कितना बेबस था मै..कितनी मज़बूरी थी ..
वास्ता प्यार का था..जिसने रोक रखा था मुझको ....
इतने करीब तो थे हम...बस इतनी ,  तो  दूरी थी...

वो दहकता अंगारा ..काले लिबास में..
कहा बचा था मै..होशो हवाश  में..
लग जाती आग या खुद जल जाता मै...
मदहोशी थी  गहरी बहुत...उस अहसास में.....

ख्वाब कई दिखा कर के ...नींदे चुराने की ...
वो ठहराव नजरो का..कातिल अदा मुस्काने की
जोगन  कहू..जालिम कहू या की सितमगर,  उसे
आदत है गन्दी बहुत   बिजलिया गिराने की.....


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