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Sunday, 3 November 2013

अब भी धार बहुत है...

"जिंदगी बहुत कुछ सीखा देती है बस फीस कुछ ज्यादा लेती है "सुना था बहुत पहले पर समझ अभी आया, दोस्ती, वफादारी , प्यार बड़े  प्यारे शब्द है, बिलकुल रेगिस्तान में मृग को नजर आ रहे पानी कि तरह.... जो होता कभी नहीं है मगर दूर से देखो तो नजर जरुर आता है … जिस के तलाश में जाने कितने ही मृग , मृगतृष्णा से मर जाते है…


मेरी हस्ती अब भी मिटी नहीं, अब भी हथियार बहुत है
हाँ जंग लगे है थोड़े से पर अब भी धार बहुत है...

नफा-नुकसान का गणित , अब सीखना पड़ा मुझे
क्या करे, मेरे दोस्त ईमानदार बहुत है  ...

इतनी जल्दी भी क्या है, चुका कर हिसाब जाने की
अरे आस्तीन के सापों का, मुझपर उधार बहुत है.....

बड़ा अजीब मिजाज है इस शहर का भी
जिसके फितरत में ही धोखा है, वो वफादार बहुत है.....

चालबाजियाँ सिख कर हर कोई शहरी हो गया
इस शहर का मौसम ,भी असरदार बहुत है......

मेरी बर्बादियों का जिम्मा , दुश्मनो पर न थोपो तुम
इसके लिए तो मेरे दोस्त यार बहुत है......

उसके जाने  की खबर से, सब अनजान बने रहे
कहने को इस शहर में, यू तो अखबार बहुत है…

Wednesday, 18 September 2013

वो एक रात बाकी है……

सपनो और हकीकत कि लड़ाई में फिर एक बार एक सपना हार गया , एक कहानी और खत्म हो गयी......  कभी नजदीकिया इतनी थी कि उनकी धड़कनो का संगीत भी सुनाई देता था और आज.....  कुछ नहीं बचा.…बस कुछ अहसाह बाकी  रह गये.....  कुछ यादें बाकी रह गयी.


मेरी सासों में तेरी खुशबु, तेरा अहसास बाकी है 
न बुझ सकी थी जो कभी, वो प्यास बाकी है
मेरे महबूब ,  मुझे फिर वो रात अता करना***
मेरे हिस्से में अब  भी , वो एक रात बाकी है

वो  मोम सा पिघलता जिस्म, वो फूलती सासें 
वो बिखरी बिखरी जुल्फे और प्यार की बातें 

वो फुल से शब्द, जो,  हवाओं में बिखरे थे 
उन शब्दो की अब भी वो,  मिठास बाकी है
मेरे महबूब ,  मुझे फिर वो रात अता करना
मेरे हिस्से में अब  भी , वो एक रात बाकी है 

वो अधखुले से होठ, वो अधखुली आँखे 
कुछ पिसती हुए कलियाँ और सिलवटे ही सिलवटे 

जिन सिलवटो के बीच खोये पड़े थे हम 
तुम आओगी वापस, उनकी, ये आस बाकी है 
मेरे महबूब ,  मुझे फिर वो रात अता करना
मेरे हिस्से में अब  भी , वो एक रात बाकी है

यूँ सिमटी थी बाँहों में, तुम, बहकी नदी सी 
उस नदी की अब भी मुझे, तलाश बाकी है 

तपिश उस रात की, क्या कहे,बस  यु समझ लो 
लबो पे रक्खा था जो अंगारा, उसकी आग बाकी है
मेरे महबूब ,  मुझे फिर वो रात अता करना
मेरे हिस्से में अब  भी , वो एक रात बाकी है 

जिन्दगी, गयी , तेरे साथ मेरे हमदम 
अब तो बस ,चलती फिरती ,लाश बाकी है 
मेरे  महबूब मुझे फिर वो रात अता करना 
मेरे हिस्से में अब भी ,वो एक रात बाकी है…… 
                                                         *** (अता करना  मतलब देना) 
                   

Thursday, 12 April 2012

कितनी मज़बूरी थी ..

कल एक कयामत , छू के बहुत नजदीक से गुजरी थी ,
उफ़ कितना बेबस था मै..कितनी मज़बूरी थी ..
वास्ता प्यार का था..जिसने रोक रखा था मुझको ....
इतने करीब तो थे हम...बस इतनी ,  तो  दूरी थी...

वो दहकता अंगारा ..काले लिबास में..
कहा बचा था मै..होशो हवाश  में..
लग जाती आग या खुद जल जाता मै...
मदहोशी थी  गहरी बहुत...उस अहसास में.....

ख्वाब कई दिखा कर के ...नींदे चुराने की ...
वो ठहराव नजरो का..कातिल अदा मुस्काने की
जोगन  कहू..जालिम कहू या की सितमगर,  उसे
आदत है गन्दी बहुत   बिजलिया गिराने की.....


पलके बिछाए बैठे थे

उमंगो के तूफान को ..दिल में  को दबाये बैठे थे 
हमें लगा था हम..कुछ छुपाये  बैठे थे .....

उन के आँखों में डूबने का शौक था हमें
और वो ,.... नजरे झुकाए बैठे थे.......

चाहा  था बाहों में भींच लू कस कर
पर वो.. खुद में ही.... सिमटे समाये बैठे थे...

ख़ामोशी को  फासले का नाम दे दिया 
अरे हम तो... पलके बिछाए बैठे  थे ....

उनके बिना जीना मुमकिन नहीं है अब 
और हम उन से ही... गुस्साए बैठे थे?...


Tuesday, 23 August 2011

अधूरी बातों को सुनने कभी तो आओ ...........

किसी एक इन्सान के चले जाने से इतना खालीपन क्यूँ महसूस होता है," उसके अलावासब कुछ अपने पास होते हुए भी  ऐसा क्यूँ लगता है की ..." कुछ कमी सी है...." क्यूँ कभी उसे भूलने को जी नहीं चाहता है.... हमेशा ऐसा क्यूँ  लगता है कि...... मुझे उसे जाने नहीं देना था..............

बिखरे सपनो को संजोये , जगती रातें रह गयी है
कुछ धुंधली सी ही सही , मीठी यादें रह गयी है
कुछ बचा है, अब भी, अनकहा अनसुना सा 
कपकपाते लबो पे कुछ बातें रह गयी.........

अधूरी बातों को सुनने कभी तो आओ
कहना था कि जी नहीं सकते मत जाओ 
वो शब्द जो आके अटके है मेरे लबो पे
उन्हें पढो, समझो please   रुक जाओ

अब जब कि जा चुकी हो मेरे जीवन से
फिर क्यूँ तड़प रहा हु मै, बिछोह कि जलन से
कुछ रास्ता बताओ तुम, तुम तो बुद्धिमान थी 
बोलो भला मिटाऊ कैसे , अंतर्मन से  

 हां,  कहा था वक़्त कि भूल जाऊंगा 
उन रास्तो पे वापस कभी ना आऊंगा 
पर लौटना कभी तुम, एक बार उन राहों से
मै अब भी वही खड़ा हु, मै कहाँ जाऊंगा

मेरे शेर डुबे है मेरी आहो में 
हर शब्द डूबा है कराहों में
मै नाउम्मीद हूँ , हर तरफ से, इक अहसास के सिवा 
कि, कभी तो आओगी तुम मेरी बाँहों में

तेरी सासों में उलझी वो मेरी सासें रह गयी है
जेहन में अब भी, वो बोलती आँखे रह गयी है
इक पल मुझे भी बख्शो कभी तो फुर्सत के
सुनो अधूरी, अनकही जो बातें रह गयी है.....................