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Friday, 29 January 2016

 हर सवाल के जवाब  में बस एक मुस्कान ,जिंदगी से भरी हुई। भले ही  उस के पास समाधान न होता हो  हर उलझन का, पर  वक़्त जरूर होता था आप को सुनने के लिए. लाख टेक की उस एक मुस्कान के लिए मेरी लिखी हुई एक कविता। एक पुरानी कविता  ....... 

हर रंग को, हर भाव को, उफ्फ यूँ छुपाना 
क्या कमाल है तेरा भी मुस्कुराना,

सम्मोहन है, या जादू है , ये छवी तुम्हारी मायावी 
गया काम से बेचारा , जो पास तुम्हारे आया भी , 

अब अपनी हालत क्या बताऊँ , ये पंक्तियाँ खुद बोलेगी,
राज- ए - दिल, शब्द शब्द, रफ्ता रफ्ता खोलेंगी,

हसूँ, मुस्कुराऊँ, या  गुम जाऊं 
या की मैं , तुम हो जाऊं,

तुम रंग हो , उम्मीद हो , हो बंदगी ,
मेरे शब्द है उलझे हुए, है उलझी हुई जिंदगी,

ना  उम्मीद , ना  गीत है, ना  रंग है ना  सादगी 
खानाबदोश फिर रहा, मैं , दरबदर , आवारगी 

उफ्फ्फ , क्यों तुली है जिंदगी, हर दर्द आजमाने में,
समेट लो न फिर मुझे, उस ठौर उस ठिकाने में 

जहां छावं थी प्यार की, सुकून मिलता था 
तुम्हारा दिल, वो दरवाजा , जो हर  दस्तक पर खुलता था,

गीत मेरे दिल की देखो,अनसुना ना छोड़ देना,
ले तो लो जो दे रहा हु , बाद में फिर तोड़ देना 

ये दूरियां ये कश्मकश कुछ कम तो हो 
मैं तुम , तुम मैं , कभी हम तो हो. ....... 







Sunday, 3 November 2013

अब भी धार बहुत है...

"जिंदगी बहुत कुछ सीखा देती है बस फीस कुछ ज्यादा लेती है "सुना था बहुत पहले पर समझ अभी आया, दोस्ती, वफादारी , प्यार बड़े  प्यारे शब्द है, बिलकुल रेगिस्तान में मृग को नजर आ रहे पानी कि तरह.... जो होता कभी नहीं है मगर दूर से देखो तो नजर जरुर आता है … जिस के तलाश में जाने कितने ही मृग , मृगतृष्णा से मर जाते है…


मेरी हस्ती अब भी मिटी नहीं, अब भी हथियार बहुत है
हाँ जंग लगे है थोड़े से पर अब भी धार बहुत है...

नफा-नुकसान का गणित , अब सीखना पड़ा मुझे
क्या करे, मेरे दोस्त ईमानदार बहुत है  ...

इतनी जल्दी भी क्या है, चुका कर हिसाब जाने की
अरे आस्तीन के सापों का, मुझपर उधार बहुत है.....

बड़ा अजीब मिजाज है इस शहर का भी
जिसके फितरत में ही धोखा है, वो वफादार बहुत है.....

चालबाजियाँ सिख कर हर कोई शहरी हो गया
इस शहर का मौसम ,भी असरदार बहुत है......

मेरी बर्बादियों का जिम्मा , दुश्मनो पर न थोपो तुम
इसके लिए तो मेरे दोस्त यार बहुत है......

उसके जाने  की खबर से, सब अनजान बने रहे
कहने को इस शहर में, यू तो अखबार बहुत है…

Wednesday, 18 September 2013

वो एक रात बाकी है……

सपनो और हकीकत कि लड़ाई में फिर एक बार एक सपना हार गया , एक कहानी और खत्म हो गयी......  कभी नजदीकिया इतनी थी कि उनकी धड़कनो का संगीत भी सुनाई देता था और आज.....  कुछ नहीं बचा.…बस कुछ अहसाह बाकी  रह गये.....  कुछ यादें बाकी रह गयी.


मेरी सासों में तेरी खुशबु, तेरा अहसास बाकी है 
न बुझ सकी थी जो कभी, वो प्यास बाकी है
मेरे महबूब ,  मुझे फिर वो रात अता करना***
मेरे हिस्से में अब  भी , वो एक रात बाकी है

वो  मोम सा पिघलता जिस्म, वो फूलती सासें 
वो बिखरी बिखरी जुल्फे और प्यार की बातें 

वो फुल से शब्द, जो,  हवाओं में बिखरे थे 
उन शब्दो की अब भी वो,  मिठास बाकी है
मेरे महबूब ,  मुझे फिर वो रात अता करना
मेरे हिस्से में अब  भी , वो एक रात बाकी है 

वो अधखुले से होठ, वो अधखुली आँखे 
कुछ पिसती हुए कलियाँ और सिलवटे ही सिलवटे 

जिन सिलवटो के बीच खोये पड़े थे हम 
तुम आओगी वापस, उनकी, ये आस बाकी है 
मेरे महबूब ,  मुझे फिर वो रात अता करना
मेरे हिस्से में अब  भी , वो एक रात बाकी है

यूँ सिमटी थी बाँहों में, तुम, बहकी नदी सी 
उस नदी की अब भी मुझे, तलाश बाकी है 

तपिश उस रात की, क्या कहे,बस  यु समझ लो 
लबो पे रक्खा था जो अंगारा, उसकी आग बाकी है
मेरे महबूब ,  मुझे फिर वो रात अता करना
मेरे हिस्से में अब  भी , वो एक रात बाकी है 

जिन्दगी, गयी , तेरे साथ मेरे हमदम 
अब तो बस ,चलती फिरती ,लाश बाकी है 
मेरे  महबूब मुझे फिर वो रात अता करना 
मेरे हिस्से में अब भी ,वो एक रात बाकी है…… 
                                                         *** (अता करना  मतलब देना) 
                   

Thursday, 12 April 2012

कितनी मज़बूरी थी ..

कल एक कयामत , छू के बहुत नजदीक से गुजरी थी ,
उफ़ कितना बेबस था मै..कितनी मज़बूरी थी ..
वास्ता प्यार का था..जिसने रोक रखा था मुझको ....
इतने करीब तो थे हम...बस इतनी ,  तो  दूरी थी...

वो दहकता अंगारा ..काले लिबास में..
कहा बचा था मै..होशो हवाश  में..
लग जाती आग या खुद जल जाता मै...
मदहोशी थी  गहरी बहुत...उस अहसास में.....

ख्वाब कई दिखा कर के ...नींदे चुराने की ...
वो ठहराव नजरो का..कातिल अदा मुस्काने की
जोगन  कहू..जालिम कहू या की सितमगर,  उसे
आदत है गन्दी बहुत   बिजलिया गिराने की.....


पलके बिछाए बैठे थे

उमंगो के तूफान को ..दिल में  को दबाये बैठे थे 
हमें लगा था हम..कुछ छुपाये  बैठे थे .....

उन के आँखों में डूबने का शौक था हमें
और वो ,.... नजरे झुकाए बैठे थे.......

चाहा  था बाहों में भींच लू कस कर
पर वो.. खुद में ही.... सिमटे समाये बैठे थे...

ख़ामोशी को  फासले का नाम दे दिया 
अरे हम तो... पलके बिछाए बैठे  थे ....

उनके बिना जीना मुमकिन नहीं है अब 
और हम उन से ही... गुस्साए बैठे थे?...


Tuesday, 23 August 2011

अधूरी बातों को सुनने कभी तो आओ ...........

किसी एक इन्सान के चले जाने से इतना खालीपन क्यूँ महसूस होता है," उसके अलावासब कुछ अपने पास होते हुए भी  ऐसा क्यूँ लगता है की ..." कुछ कमी सी है...." क्यूँ कभी उसे भूलने को जी नहीं चाहता है.... हमेशा ऐसा क्यूँ  लगता है कि...... मुझे उसे जाने नहीं देना था..............

बिखरे सपनो को संजोये , जगती रातें रह गयी है
कुछ धुंधली सी ही सही , मीठी यादें रह गयी है
कुछ बचा है, अब भी, अनकहा अनसुना सा 
कपकपाते लबो पे कुछ बातें रह गयी.........

अधूरी बातों को सुनने कभी तो आओ
कहना था कि जी नहीं सकते मत जाओ 
वो शब्द जो आके अटके है मेरे लबो पे
उन्हें पढो, समझो please   रुक जाओ

अब जब कि जा चुकी हो मेरे जीवन से
फिर क्यूँ तड़प रहा हु मै, बिछोह कि जलन से
कुछ रास्ता बताओ तुम, तुम तो बुद्धिमान थी 
बोलो भला मिटाऊ कैसे , अंतर्मन से  

 हां,  कहा था वक़्त कि भूल जाऊंगा 
उन रास्तो पे वापस कभी ना आऊंगा 
पर लौटना कभी तुम, एक बार उन राहों से
मै अब भी वही खड़ा हु, मै कहाँ जाऊंगा

मेरे शेर डुबे है मेरी आहो में 
हर शब्द डूबा है कराहों में
मै नाउम्मीद हूँ , हर तरफ से, इक अहसास के सिवा 
कि, कभी तो आओगी तुम मेरी बाँहों में

तेरी सासों में उलझी वो मेरी सासें रह गयी है
जेहन में अब भी, वो बोलती आँखे रह गयी है
इक पल मुझे भी बख्शो कभी तो फुर्सत के
सुनो अधूरी, अनकही जो बातें रह गयी है.....................

Saturday, 18 June 2011

For you, Forever...........

I liked her smile, her eyes, her black dark hairs, her way of talking, her presence, each and everything which belongs to her.. but i was in confusion.. Do i like her or i love her? and finally i am ready to accept it that i love her...yes i love her. . . . . . . . . . . . . . . .


Finally i want to take a stand
I want to hold your hand, 
And say, I am here
For you, Forever...........


Its not happened suddenly
Its not a surprise,
Its not the first time 
When i realized.......... 


That,  without  you 
Life is no life,
That,  without you
I cant survive............


I am dieing
And i need you,
I am destroying
And i need you....


Come soon 
And make me alive,
Sweetheart without you
I cant survive...................................................






Saturday, 13 March 2010

मेरी भी याद रही होगी...

एक शायर ने कहा है "मुहब्बत मे बुरी नियत से कुछ सोचा नहीं जाता, 
                                    कहा जाता है उसको बेवफा , समझा नहीं जाता."
                                              
कोई आशिक ये कभी मान ही नहीं सकता कि "वो बेवफा थी "  अरे ,मुब्ब्हत मे उन बातों पर भी यकीन करने को दिल करता है जो पता नहीं सच होती भी है या नहीं , वो बातें जो सिर्फ ख्वाब मे होती है , और जिनकी वास्तविकताओं का कभी पता नहीं चलता...मन को लगता है कि ऐसा हुआ होगा या हो रहा होगा , पर होता क्या है ये कभी पता नहीं चलता........




मै तारे गिनता हूँ रातों को , वो भी तो जाग रही होगी
मैं उससे भागा फिरता हूँ , वो मुझसे भाग रही होगी .....?

कहती है मुझको वेबफा वो अपनी सखियों में
लब थरथरा रहे होंगे , कापती जुबान रही होगी....?

उभरा था आज अस्क उनका , एक पल को शायद झरोखे पे
इन्तजार मे मेरे,  खिड़की से झाकं रही होगी .....?

देखा नहीं पलटकर के मैंने तो भरपूर नजर
पर वो ओझल होने तक मुझको ही ताक़ रही होगी .....?

डाला होगा चादर जब, तन पे ढलती रातों मे
तब रोम रोम को उनके,  मेरी भी याद रही होगी....?

सुना है,  है इरादा उनका फिर से दिल लगाने का
अरे झूठी-मुठी बातों से गम बात रही होगी....?

अगर आया होगा याद कहीं , पिछली बारिश का मौसम तो
सुर्ख होठों को अपने वो , दाँतों से काट रही होगी.....?

Tuesday, 23 February 2010

सानिया से शादी ( एक हास्य कविता)

कविता लिखने से पहले मै आपको अपने बारे में कुछ बताना चाहता हूँ , में एक छोटी औकात का आदमी हूँ इसलिए कभी कभी छोटी छोटी कल्पनाये भी कर लेता हूँ , एक बहुत छोटी सी कल्पना की हैं मैंने और जिसका शीर्षक दिया हैं ''कि अगर मौका मिले मुझे सानिया मिर्जा से शादी का''  , तो हैं ना ये एक बहुत छोटी सी कल्पना ........कविता लिख रहा हूँ मजा लीजियेगा ......


अगर मौका मिले मुझे , 
सानिया मिर्जा से शादी का 
मैं तो सौदा कर लूँगा 
झट अपनी आजादी का


भले ही वो मुझसे सारे 
काम करायेगी 
पर बीबी तो आखिर वो
मेरी ही कहलायेगी 


अरे थोड़े  कपड़े पहनती है 
वो थोड़े ही धोउंगा
बर्तन भी मंज्वाये तो
 काहे को रोउंगा


सब पति तो करते है 
मै भी कर लूँगा
अरे बठे बिठाए एक दिन 
कड़ोड़पति तो रहूँगा  


और सुन लूँगा अगर सानिया 
सुनाएगी दो बात
भला किसे बुरी लग सकती हैं
दुधारू गाय की लात


बस प्राथना करे कि सानिया मुझको
विदा कराके ले जाये 
और मेरी शादी के मौके पर
आप सब जरुर आये................

Monday, 22 February 2010

कौन साथ चलता हैं यहाँ ......

बचपन से सुना करते थें कि हम अकेले आते हैं  और अकेले ही जातें हैं , और अब जब थोड़ी समझदारी हुई तो पता नही क्यों इन बातों पर यकीन करने को दिल करता हैं. सच ही तो हैं, और मुझे तो लगता है कि हम ताउम्र  अकेले ही होते है अपने गम और खुशियों मे..... 

कौन साथ चलता हैं यहाँ , उम्रभर के लिए
ये रहबर*( रस्ते का साथी) , ये रहबर सुकून आँखों के तसल्ली है नजर  के लिए..

आज यहाँ ठहरे तो मुलाकात हो गई
कौन जाने कल हम चल देंगे किधर के लिए..

जो नेमते थी , खर्च दी यारों की मुस्कानों पे
अब बचा ही क्या है पास मेरे फिकर के लिए..

ना इबादत की जरुरत है, ना सजदा करो मेरे यारों
एक दुआ ही काफी है मुझे , असर के लिए ..

ना थमाओ रिश्तों की डोर, मैं थम ना सकूंगा
जो है, बहुत हैं , एक ऊमर के लिए ..

दूर करलो आज ही  गिले, शिकवे, शिकायतें
क्या पता फिर वक़्त ना मिले , अगर मगर के लिए ..

जो चुभने लगूं मैं आँखों में, तो खुद हे चला जाऊंगा
क्यों खर्च करोगे दो पैसे , जहर के लिए.............

Sunday, 21 February 2010

कहाँ आके रुका हूँ.....

कभी कभी जिन्दगी मे ऐसे भी पल आते है जब लगता है कि आपके लिए सब कुछ ख़त्म हो चूका है सबकुछ बिखर चूका  है और आप चाह कर के भी कुछ नहीं कर सकतें है  ,  और तो और वो लोग भी आप पर ऊँगली उठाने लगतें है जो कल तक आप के सामने आने से कतराते थें. जब आपसे लोग ये पूछ्तें  है की आपकी पहचान  क्या है ? तो सिवाए एक मौन के आपके पास कोई ऊतर नहीं होता है प्रस्तुत कविता मैंने उस समय लिखी थी जब मेरे सामने भी पहचान का संकट खरा हो चूका था , अगर आपने कभी जिन्दगी मे विफलताओं को महसूस किया है तो कहीं ना कहीं से ये आपको आपकी अपनी कहानी लगेगी .........


हार गया हूँ मैं, या बस थक कर झुका हूँ
कहाँ जाना है मुझको ,कहाँ आके रुका हूँ
कबसे गोते खा रहा हूँ इन हवाओं में इस कदर
कि जैसे दरख्तों से बिछड़ा मैं एक पत्ता टुटा हूँ......

ये कैसी स्थिरता हैं , ये कैसा ठहराव है
जिन्दगी, मानो लहरों पे खेलती हुई नाव हैं
जल रहा हूँ कड़ी धुप में , यूँ कबसे खडा मैं
ना बादल का टुकड़ा हैं , ना पेड़ों की छाव हैं
क्यों हंसी से महरूम मैं , खुशियों से जुदा हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको कहाँ आके रुका हूँ.......

ना भोर की सुगबुगाहट हैं ना चिडियों की आवाज हैं
बड़ी लम्बी ये बड़ी विचित्र रात हैं
पर क्या करूंगा मैं , सहर*(नई सुबह ) देख करके भी
ना मंजील का पता हैं , ना रास्ता ही याद हैं
मैं चिंगारी से आग बना , पर अब बुझता धुवाँ हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको , मैं कहाँ आके रुका हूँ.....

अपनी नाकामियों का जशन यूँ कब तक मनाऊँगा
इन ऊलझनों में कब तक मैं ऊलाझाता जाउंगा
कि अब तो उठने लगी हैं उन्गलीयाँ, काबिलियत पर मेरे
जो पूछेंगे सवाल लोग, तो उन्हें क्या बताऊंगा 
क्या कहूँ कि इन नाकामियों से मैं टूट चुका हूँ
कहाँ जाना हैं मुझको , कहाँ आके रुका हूँ ....................................

बस मैं रंग भरूँगा ..............

मैंने ये कविता अपनी बहन के लिए लिखी थी ,ये  एक वादा था मेरा उससे इन पंकित्यों के माध्यम से ,और एक ऊमीद भी कि एक दिन सबकुछ ठीक हो जायेगा, अपनी जिंदगी को हम एक दिन अपनी उँगलियों पे नचाएंगे .....................

जीवन के इस रस्ते पर तेरे संग चलूँगा
तू सपने देखती जाना, बस मे रंग भरूँगा
सोचना ना ये कभी की तू तन्हा अकेली है
उदासी के क्षणों मे भी मैं उमंग भरूँगा .

ना कर अफ़सोस उस वक़्त पे , जो गुजरता जा रहा है
आने वाला कल तेरा , खुशियों से नहा रहा है
खड़ी हो जा दरवाजे पर तू स्वागत कर बाहें फैला
कि रात स्याह बीत रही है , नया सवेरा आ रहा है

दुआ कर खुदा से के ऐसा वक़्त आये जरूर
फक्र हो तुझे मुझपे भी , रिश्तों पर आये गुरूर
चल खुदा से साथ साथ ये दुआ भी मांग ले
कि रगड़े चिराग तू, मैं निकलू , और पूछु क्या है हुक्म हुजुर .

जितनी मर्जी तू पावं फैला , चादर मे सिलूँगा
तू सपने देखती जाना , बस मैं रंग भरूँगा ..............................

 




एक छोटी सी दुनिया .......

ये एक कल्पना है एक बहुत प्यारी , सपनो जैसी दुनिया की . 
ये एक उम्मीद है एक ख्वाब है और कुछ नहीं....


एक छोटी सी दुनिया हो मेरी
एक छोटा सा जहान हो
जहाँ रिश्ते सर छुपा सके
ऐसा एक मकान हो.

हर ईट प्यार से जुड़े
हर ईट मे ही याद हो
दीवार नहीं हो रिश्तों में
बस प्यार की बुनियाद हो.

खनक हो उनके चूड़ी की
और पायल की झंकार हो
आँख खुले जब सुबह सुबह
तो बस उनका दीदार हो.

जहाँ मैं रहूँ , वो रहे
और चांदनी रात हो
हवा चले कुछ मद्धम मद्धम
तारों की बरसात हो.

जुल्फों मैं उनके दिन गुजरे
बाँहों मैं उनके शाम हो
हो प्यार की लाली होठों पर
और जुबान पर मेरा नाम हो.

ना कोई सीमायें हो
ना जिक्र कही हो बंधन का
आँखों की भाषा आँखें पढले
हो प्यार जरिया संबोधन का.

इस प्यार से कुछ फूल खिले
कुछ नाम हो उनके प्यारे से
छाया हो हम दोनों की
लगे वो कुछ हमारे से.

फिर प्यार सुने और प्यार कहे
बस प्यार रहे और प्यार रहे
प्यार ही आगाज था और प्यार ही अंजाम हो
प्यार के ही छाँव तले जिंदगी की शाम हो ..............................









Saturday, 20 February 2010

अभी से ही बहक रहा है .......

 कभी कभी जब मन को मनचाहा मिल जाता है , या मिलने की उमीद रहती है तो वो फिर बहकने लगता है और वो इतना बहक जाता है कि उसे कहना पड़ता है कि.............

संभल ऐ दिल तू इतना क्यों धड़क रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है

पैमाना तो उनके लैब है , उनका साथ साकी है
मयखाना सुख गया तो क्या हुआ , लबो पे प्यास बाकी है
जाओ जाकर कह दो उनसे, अभी हम मद्होश  ना होंगे
कि उनकी साँसों कि छुअन उनका अहसास बाकी है

क्यों हर कोना दिल का उनकी खुशबू से महक रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है

कब तक सन्नाटों मे तू उनका नाम पुकारेगा
कितनी रातों को उनकी यादों  से सवारेगा
जा अभी सो जा तू नींद पूरी कर ले
तभी तो उनकी बाहों मे रात गुजरेगा

तरी साँसों मे ये गर्मी कैसी , क्यों ये दहक रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है

अरे होश मे आ , होश में आ , अभी तो संभालना है
अभी तो दो जिस्मो को , दो ज़ानो को मिलना है
बस बंद कर निगाहे और महसूस कर उस पल को
जब तेरे प्यार को तेरे बाहों मे पिघलना है

बस सोच कर ही सबकुछ तू इतना क्यों चहक रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है

क्यों उनकी यादों मे रात ख़राब कर रहा है
क्यों रेत पर नाम लिखकर वक़्त बर्बाद कर रहा है
ये उदासी कैसी , और तेरी हंसी कहाँ गयी
अरे खुशिया मन कमबख्त तू प्यार कर रहा है

संभल संभल संभल, तू इतना क्यों धड़क रहा है
अभी निगाहों से ही पी है अभी से ही बहक रहा है .............................





सब कुछ तो वही था...............

..........और एक दिन उसकी शादी हो गयी, वो चली गयी मेरी दुनिया से, लोगों ने कहा हमेशा हमेशा के लिए , और फिर लोगों ने कहा 'कि वो बहुत खुश है अपनी दुनिया में, मेरे लिए सबकुछ ख़त्म हो गया ' वो भरोसा, वो उम्मीद, वो बातें , वो सपने, वो प्यार सब कुछ... ....... सब कुछ ख़त्म हो गया. पर मुझे यकीन था कि "ना मै हारा हु ना मेरा प्यार".... और एक दिन वो मुझे से मिली , बिलकुल उसी तरह .........................................


मै वक़्त के दौर मे पीछे रह गया
वो जाने किस गली मे खो गयी
सुना था कि सब बदल गया
कह रहे थे लोग कि वो किसी और की हो गयी ,
फिर ये सुना था कि वो बदल जाएगी ,
पर मुझे यकीं था ,कि वो जब भी आएगी ,वैसे ही आएगी
अब लोग गलत थे मै  बिलकुल सही था
कहाँ कुछ बदला था , सबकुछ तो वही था
वही बातें थी उसकी, वही हंसी थी
उस खास शब्द पे आके आज फिर वो फ़सी थी
वो वैसी ही भोली थी , वैसा ही मन था
वही शालीनता थी उसमे , वही अपनापन था
उसके हंसने , बोलने, चलने का ढंग वही था
और तो और, उसके नाखून पालिश का भी रंग वही था
दिखा नहीं मुझे तो उसपे , वक़्त का कोई असर
अरे हां , आज भी पसंद था उसे फ्रिज का वही मरुन कलर
"वो बदल जाएगी", ये सारी बातें थी बेकार
कहाँ कुछ बदला था सब कुछ तो वही था यार
पर कुछ तो नया उसके जीवन मे चल रहा था
वो उस चाँद का टुकरा था , जो आँचल तले पल रहा था
वो बहुत प्यारी बहुत मासूम बच्ची थी
एक शब्द मे कहें तो वो बहुत बहुत अछ्छी थी
वो माँ जैसी थी , हां हां वही रूप था
वो उसके कंधे पे सोई थी , वो दृश्य भी क्या खूब था
गोद मे मेरे वो थी , मेरे हाथ मे था उसका छोटा हाथ
वो बिलकुल सपने जैस था , जिसपर मुश्किल था करना बिश्वास
वो जो बातें कि थी हमने कभी जागती रातों मे
इसका भी तो जिक्र था , उन सपनो जैसी बातों मे
उस एक पल मे उस बच्ची ने मुझे बहुत कुछ था दे दिया
जिन्दगी की कुछ लम्हें तेरे नाम भी थे 'जिया '
ये पल ये लम्हा हमेशा याद रहेगा
ताउम्र मेरे साथ ये बिश्वास रहेगा
ना मै हारा हु ना मेरा प्यार
वो फिर मिलेंगी मुझसे , मुझे बिश्वास रहेगा..............................